सरकार एक तरफ विभिन्न तरह के कर लगा के अपना ख़ज़ाना भरती है फिर सरकारी क्षेत्र की कंपनिओ से लाभ वसूली की आशा करती है,यह दोहरी मार आम जनता को सहन करनी पड़ती है और इस दोहरी आय का बड़ा हिस्सा स्विस बॅंक में जमा हो जाता है और बाकी का फ़िज़ूल खर्ची में उड़ जाता है| किसी कार्यलया में काम करने वाले चपरासी को भी कर देना पड़ता है लेकिन १०० एकड़ वाले ज़मींदार को सभी कर माफ़ हैं, उसके खर्चे भी चपरासी स्तर के लोग वहन कर रहे हैं,कोई नेता,बड़ा लाला भी कर नहीं डेतओर धौंस ही देता है|यह धाँधलियाँ आम आदमी कब तक सिसक सिसक कर सहता रहेगा,कब तक उसके अंदर लावा बहता रहेगा,उस लावे के फूटने की प्रतीक्षा ना करें |